चाहे आप निवेश की दुनिया में नए हों या टेडिंग के नए तरीकों की तलाश कर रहे हों, आपने ‘डेरिवेटिव’ शब्द जरुर सुना होगा। डेरिवेटिव ट्रेडिंग में कॉन्ट्रैक्ट होते है, इनमें जोखिम शामिल होता हैं। इसलिए यहां आपको Derivatives Meaning in Hindi में  डेरिवेटिव के प्रत्येक पहलु से आपको अवगत करायेंगे।

डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट हैं जो किसी स्टॉक्स या इंडेक्स से अपना मूल्य प्राप्त करते हैं। इनका व्यापक रूप से ट्रेड करने और पैसा बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। कुछ ट्रेडर्स इन्हे अपनी पोजिशन को हेज करने व जोखिम को कम करने के लिए उपयोग करते हैं। इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे Derivatives meaning in Hindi.

 

Derivatives Meaning in Hindi 

डेरिवेटिव फाइनेंसियल कॉन्ट्रैक्ट होते हैं जिनकी प्राइस किसी फाइनेंसियल सिक्योरिटी के प्राइस पर निर्भर होती है। डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट आमतौर पर स्टॉक, बॉन्ड, करेंसी, कमोडिटी और मार्केट इंडेक्स पर इस्तेमाल किए जाते हैं। फाइनेंसियल सिक्योरिटी का प्राइस बाजार की स्थितियों के अनुसार बदलता रहता है। ट्रेडर्स डेरिवेटिव कॉन्ट्रेक्ट में प्रवेश करते है क्योंकि ट्रेडर्स भविष्य में फाइनेंसियल सिक्योरिटी के प्राइस पर अनुमान लगाकर लाभ अर्जित करना चाहते है।

कल्पना कीजिए कि किसी इक्विटी शेयर का मार्केट प्राइस ऊपर या नीचे जा रहा है। जब उस स्टॉक प्राइस में गिरावट होगी तो आपको नुकसान होगा। जबकि उस स्टॉक प्राइस में बढोतरी होगी तो आपको लाभ होगा।

इसे आसानी से समझते है,

आप जानते है कि दही दूध से ही बनता है, अगर दूध नही होगा तो दही नही बन सकता है इस तरह हम कह सकते है कि दही दूध का डेरीवेटिव है, क्योकि दही को दूध से डिराईव किया गया है।

अव शेयर मार्कट में, रिलायंस फ्युचर एक डेरीवेटिव कॉन्ट्रेक्ट है जो कि रिलायंस के शेयर पर निर्भर करता है जैसे कि हमने दूध दही के उदाहरण से समझा। अव अगर रिलायंस का शेयर बढेगा तो रिलायंस फ्युचर भी बढेगा और रिलायंस का शेयर गिरेगा तो रिलायंस फ्युचर भी गिरेगा। यानि की सीधे शब्दों में कहे, डेरीवेटिव कॉन्ट्रेक्ट की प्राइस उसके स्टॉक पर निर्भर करती है।

अभी तक आपको Derivatives Meaning in Hindi समझ आ गया होगा, अभी हम डेरिवेटिव के प्रकार को समझते है:

 

डेरिवेटिव के प्रकार

डेरिवेटिव मार्केट में चार प्रमुख प्रकार के कॉन्ट्रैक्ट होते है जो इस प्रकार है:

ऑप्शन :- ऑप्शन डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट हैं जो खरीदार को एक निश्चित अवधि के दौरान निश्चित मूल्य पर किसी इंडेक्स या स्टॉक को खरीदने/बेचने का अधिकार देते हैं। खरीदार ऑप्शन का प्रयोग करने के लिए किसी भी तरह से बाध्य नही है, ये उसकी मर्जी पर निर्भर करता है कि वह अपने कॉन्ट्रैक्ट का उपयोग करना चाहता है या नही। ऑप्शन खरीदार अवधि की समाप्ति से पहले किसी भी समय अपने ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट का प्रयोग कर सकता हैं। इसके अलावा जो ऑप्शन बेंचता है उसे ऑप्शन राईटर या ऑप्शन सैलर कहते है।

फ्यूचर्स :- फ्यूचर्स मानकीकृत(Standardized) कॉन्ट्रैक्ट हैं जो धारक को एक निश्चित तिथि पर एक सहमत प्राइस पर स्टॉक, कमोडिटी, कंरेसी या इंडेक्स खरीदने/बेचने की अनुमति देते हैं। इन कॉन्ट्रैक्टो का स्टॉक एक्सचेंज में कारोबार होता है। फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट की प्राइस हर दिन बाजार में मार्केट कंडीशन के हिसाव से बदलती रहती है। इसका मतलब है कि आप फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट की समाप्ति तिथि तक बाजार की गतिविधियों के अनुसार ट्रेड कर सकते है।

फॉरवर्ड :- फॉरवर्ड फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स की तरह ही होते हैं जिसमें धारक कॉन्ट्रैक्ट को पूरा करने के लिए बाध्य होता है। लेकिन फॉरवर्ड मानकीकृत(Standardized) नही हैं इसलिए इनका स्टॉक एक्सचेंजों पर कारोबार नहीं होता हैं। ये ओवर-द-काउंटर ट्रेड होते हैं ये कॉन्ट्रैक्ट दो पार्टियों के बीच एक निश्चित तिथी पर पहले से तय कीमत पर भविष्य में डील की जाती है। इस प्रक्रिया को फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट कहा जाता है।

स्वैप :- स्वैप डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट हैं जिसमें दो निजी पक्ष अपने कैशफ्लो का आदान-प्रदान करते हैं। स्वैप कॉन्ट्रैक्ट ऊपर दिए गए सभी कॉन्ट्रैक्ट्स में सबसे कठीन और जोकिम भरे है, स्वैप कॉन्ट्रैक्ट किसी भी एक्सचेंज पर ट्रेड नही होते है ये विचोलियों द्वारा ट्रेड किए जाते है और इनका कारोवार ऑवर-द-काउंटर पर किया जाता है।

 

डेरिवेटिव मार्केट में ट्रेड कैसे करें?

वैसे तो आपने ऊपर देखा कि कुल चार प्रमुख कॉन्ट्रैक्ट होते है लेकिन हम सिर्फ फ्यूचर्स और ऑप्शंस में ही ट्रेड कर सकते है इसलिए अभी हम देखते है फ्यूचर्स और ऑप्शंस में कैसे ट्रेड करे?

फ्यूचर ट्रेडिंग कैसे करें?

फ्यूचर ट्रेडिंग शुरू करना बहुत आसान है। वस आपको एक ब्रोकर के साथ एक खाता खोलना होगा, फिर आप फ्यूचर में ट्रेडिंग शुरु कर सकते है। फ्यूचर ट्रेडिंग आप प्रत्येक शेयर में नही कर सकते है ये एक्सचेंज का निर्णय होता है कि किन – किन शेयरों में फ्यूचर ट्रेडिंग की जा सकती है।

इसके अलावा इंडेक्स में सिर्फ ऑप्शन और फ्यूचर ट्रेडिंग के माध्यम से ही ट्रेड किया जा सकता है। इंडेक्स बहुत सारे शेयर के समुह को मिलाकर बनायें जाते है जैसे, निफ्टी 50 भारत की 50 कंपनियों को मिलाकर एक इंडेक्स बनाया गया है ये इंडेक्स एक्सचंज द्वारा बनाएं जाते है।

एक उदाहरण के माध्यम से समझते है, मानलो आपको लगता है कि अगले एक महिने में मार्केट गिरने बाला है इस स्थिती में आप एक महिने बाद की एक्स्पायरी पर फ्यूचर सैल कर सकते है फिर जैसे ही मार्केट गिरेगा आपको लाभ होगा। इसके अलावा डे ट्रेडर्स फ्यूचर ट्रेडिंग मार्केट के उतार – चढाव से लाभ करने के लिए भी करते है।

 

ऑप्शन ट्रेडिंग कैसे करें?

ऑप्शन ट्रेडिंग, स्टॉक ट्रेडिंग के मुकाबले थोडी जटिल लग सकती हैं। जब आप कोई शेयर खरीदते हैं, तो आप सिर्फ यह तय करते हैं कि आपको कितने शेयर चाहिए, और आपका ब्रोकर मौजूदा मार्केट प्राइस या आपके द्वारा निर्धारित प्राइस पर ऑर्डर को पूरा कर देता है। लेकिन ऑप्शन ट्रेडिंग के लिए सही रणनीतियों की समझ होनी चाहिए।

आप किस दिशा में किसी स्टॉक या इंडेक्स के प्राइस के जाने की उम्मीद करते हैं, यह निर्धारित करता है कि आपको किस प्रकार का ऑप्शन को लेना है:

  • अगर आपको लगता है कि स्टॉक की कीमत बढ़ेगी: कॉल ऑप्शन खरीदें या पुट ऑप्शन बेचें।
  • अगर आपको लगता है कि स्टॉक की कीमत स्थिर रहेगी: कॉल ऑप्शन बेचें और पुट ऑप्शन बेचें।
  • अगर आपको लगता है कि स्टॉक की कीमत घटेगी: पुट ऑप्शन खरीदें या कॉल ऑप्शन बेचें।

नोट – ऑप्शन ट्रेडिंग में ऑप्शन सैलर के पैसा बनाने की प्रवृति ऑप्शन खरीददार के मुकाबले ज्यादा होती है, क्योकि ऑप्शन खरीददार तभी पैसा कमा सकता है जब उसका खरीदा गया ऑप्शन बहुत तेजी से उसकी दिशा निर्धारित दिशा में मूव करे। लेकिन ऑप्शन सैलर, इसकी दिशा में ऑप्शन जायेगा तब भी पैसा बनायेगा और अगर वह स्टॉक या इंडेक्स साइडवेज रहेगा तव भी पैसा बनायेगा।

 

डेरिवेटिव मार्केट में कौन – कौन भाग लेता है?

प्रत्येक व्यक्ति का डेरिवेटिव मार्केट में भाग लेने का अपना एक उद्देश्य होता है। हमने उनके व्यापारिक उद्देश्यों के आधार पर निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया है:

हेजर्स :- ये शेयर मार्केट में जोखिम से बचने या जोकिम को कम करने वाले ट्रेडर्स हैं। ये शेयर मार्केट में जोकिम और प्राइस के उतार – चढाव के खिलाफ अपने निवेश पोर्टफोलियो को सुरक्षित करने के लिए डेरिवेटिव का उपयोग करते हैं। कल्पना कीजिए कि आपके पास XYZ कंपनी के 100 शेयर हैं जिन्हे आपने 500 रुपये प्रति शेयर के हिसाव से लम्बी अवधि के लिए अच्छा रिटर्न पाने की उम्मीद में खरीदकर रखे  है। हालांकि, आप मार्केट में आने बाली गिरावट के कारण नुकसान नहीं उठाना चाहते हैं। साथ ही, आप भविष्य में उन्हें अधिक कीमत पर बेचकर मुनाफा कमाने का अवसर नहीं खोना चाहते है। इस स्थिति में, आप उसी स्टॉक के फ्युचर या ऑप्शन कॉन्ट्रेक्ट को खरीद सकते हैं जो आपके पोर्टफोलियो को नुकसान से बचायेंगा। इस प्रक्रिया को हेंजिग कहते है।

स्पेकुलेटर :- ये डेरिवेटिव मार्केट में जोखिम लेने वाले व्यक्ति होते हैं। ये मुनाफा कमाने के लिए ज्यादा जोखिम लेने से नही डरते हैं। हेजर्स की तुलना में इनका दृष्टिकोण बिल्कुल विपरीत होता है। स्पेकुलेटर वही होते है जो मार्केट को बिना समझे ही इसमें आ जाते है और बिना रिस्क को समझे ही मार्केट में ट्रेड करना शुरु कर देते है। शेयर मार्केट में यही लोग सबसे ज्यादा पाए जाते है यही कारण है कि शेयर बाजार में 95% ट्रेडर्स अपना पैसा गवांते है।

मार्जिन ट्रेडर्स :- मार्जिन उस न्यूनतम राशि को कहते है जिसे आपको डेरिवेटिव मार्केट में ब्रोकर के पास ट्रेड लेने के लिए जमा करने की आवश्यकता होती है। जब आप कोई ट्रेड लेते है तो आपको उसका पूरा पैसा देने की बजाय कुछ प्रतिशत देना होता है जिसे मार्जिन देना होता है इसमें डे ट्रेडर्स, ऑप्शन ट्रेडर्स और फ्युचर ट्रेडर शामिल होते है। कल्पना कीजिए कि 2 लाख रुपये की राशि के साथ आप शेयर बाजार में ट्रेडिंग के लिए आते है फिर जब आप किसी स्टॉक में ट्रेड लेते है और आपको ब्रोकर की तरफ से 5x मार्जिन मिलता है तो आप 2 लाख x 5 यानि कि 10 लाख रुपये तक के ट्रेड वैल्यु के साथ ट्रेड कर सकते है।

आर्बिट्राजर्स :- ये शेयर बाजार में लाभ कमाने के लिए कम जोखिम वाले बाजार की खामियों का उपयोग करते हैं। ये एक साथ एक बाजार में कम कीमत पर शेयरो को खरीदते हैं और उन्हें दूसरे बाजार में अधिक कीमत पर बेचते देते हैं। यह तभी हो सकता है जब एक ही सिक्योरिटी को अलग-अलग बाजारों में अलग-अलग कीमतों पर कोटेड किया जाता है। जैसे मान लीजिए कि ये शेयर बाजार में एक इक्विटी शेयर को 1000 रुपये प्रति शेयर के हिसाव से खरीदता है और फ्युचर मार्केट में 1050 रुपये पर बेंचता है। इस प्रक्रिया में, वह 50 रुपये का कम जोखिम वाला लाभ कमाता है।

 

डेरिवेटिव ट्रेडिंग कैसे सीखे?

जैसा कि हमने पहले ही समझ लिया है कि डेरिवेटिव ट्रेडिंग दो तरह से की जा सकती है एक फ्युचर ट्रेडिंग और दूसरा ऑप्शन ट्रेडिंग। अव ये आपको निर्णय लेना है कि आप फ्युचर ट्रेडिंग सीखना चाहते है या ऑप्शन ट्रेडिंग।

फ्युचर ट्रेडिंग कैसे सीखे:- फ्युचर ट्रेडिंग सीखने के लिए आपको सबसे शेयर मार्केट के वैशिक्स को समझना होगा, और उसके वाद आपको टेक्निकल एनालिसिस सीखना होगा। इतना सीखना के बाद रोज चार्ट पर एनालिसिस करना शुरु करदे जिससे कि मार्केट को आप वेहतर तरह से समझ सके। सबसे अंत में फ्युचर ट्रेडिंग सीखे जैसे – फ्युचर ट्रेडिंग क्या है, कॉन्ट्रेक्ट, एक्सपायरी, लोट इत्यादि। इसके साथ मनी मैंनेजमेंट को जरुर समझे क्योकि यही आपको सिखायेगा कि जोकिम को कैसे कम किया जाए।

ऑप्शन ट्रेडिंग कैसे सीखे:- ऑप्शन ट्रेडिंग, फ्युचर ट्रेडिंग के मुकाबले थोडी जटील है, ऑप्शन ट्रेडिंग के लिए आपको मार्केट का वैशिक्स, टेक्निकल एनालिसिस के साथ – साथ ऑप्शन वैशिक्स, ग्रीक्स और ऑप्शन स्ट्रेटजियों को भी सीखना होगा।

निष्कर्ष

डेरीवेटिव जोकिम भरे होते है इसलिए डेरीवेटिव ट्रेडिंग की शुरुआत इसे अच्छे से सीखने व समझने के बाद ही करे। तो अभी हम Derivatives Meaning in Hindi में समझ गए है, कि आखिर ये डेरिवेटिब क्या है। तो अगर आपको Derivatives Meaning in Hindi लेख से संबधित कोई भी सबाल है तो हमें कमेट करे, आपकी पूरी सहायता की जायेगी।